"चाँद भी अधूरा है"
कहते हैं, मोहब्बत तब मुकम्मल होती है
जब दो दिल मिल जाते हैं।
मगर हमारे लिए मोहब्बत
उस नियम से अलग हैं।
क्योंकि मेरी दुनिया में,
मिलने से ज़्यादा
महसूस करना अहम हैं…
वो अजनबी वही… जिसे मैंने बेइंतहा चाहा।
पहले मुलाकात,
कभी दो शब्दों की चुप्पी,
कभी अपनो सी बातें,
कभी अंजानी मगर...
दिलकश सुबह की गुफ़्तगू,
हल्की कालि सी शाम में
कुछ क़दमों का साथ,
कभी मुस्कुराहटों में छिपी तन्हाई…
सब कुछ मिला,
सिवाय उस रिश्ते के,
जिसकी ख्वाहिश मैंने भी नहीं की,
और वो अजनबी सा तालुक़
दिल में छुपा लिया यूँही, कहीं।
एक किताब मेरे नज़दीक
सबसे खुबसुरत तोहफा
और, अपनी मोहब्बत से
किताबों के पन्नों में लिपटा
एक छोटा सा ख़त…
मगर जवाब वही पुराना था
"नहीं।"
और मालूम नहीं, मगर हक़ीक़त है
उनके हाँ से ज्यादा मोहब्बत
मुझे उनके इनकार से रही,
दूर रहने की वजह तो न दी,
बल्कि एक वजह मुझे और मिल गई
उनसे मोहब्बत करने की ।
उस दिन कहीं पहली बार समझा,
कि मोहब्बत को पाने के लिए,
कभी-कभी मोहब्बत से दूर होना
बेहतर होता हैं, दिलक़श होता हैं
उनके इकरार से ज्यादा ख़ुशी
उनके इनकार से होती हैं ।
वो कभी साथ नहीं…
मगर ख़्वाबों में…
ख्यालों में
बस मेरे है।
कभी किसी खामोश रात में,
कभी बारिश की खुशबू में,
कभी किसी अंजाने से गीत की धुन में…
तो कभी किसी अनकहे शोर में,
उलझे से एहसासो में महसूस करते,
जैसे वो बैठे हो कहीं आस-पास,
जैसे चुप्पी भी बातें करती हो ।
या हम जानते है कभी,
कि हक़ीक़त में
हम कभी पा ही नहीं सकते,
उस चाहत को जो दिल में
मोहब्बत का एहसास बांधे बैठी होती हैं
मगर ख़्वाबों में, एक एहसास बन
घर कर देती हैं वो चाहत...
और शायद,
यही मोहब्बत की सबसे
बड़ी खूबसूरती है।
अधूरी होकर भी,
सबसे गहरी लगती हैं…
सबसे सच्ची लगती…
बेइंतहा।