हादसा या हत्या ?
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हमारा देश तरक्की कर रहा है।
मेट्रो चल रही है, बुलेट ट्रेन आने वाली है, और सड़कें?
सड़कें मौत का गम बाँट रही हैं—एक गड्ढा, एक दुर्घटना फ्री!
आपने सुना होगा—
“गाय माता है।”
लेकिन माता अब बीच सड़क झुंड बनाकर पर बैठ जाती हैं।
और अगर कोई उनसे टकरा कर मर जाए तो सिस्टम कहती है—
“भाग्य खराब था।”
वाह! मतलब गाय माता अब भाग्य-विधाता भी हो गईं!
अरे भाई,
गड्ढा सड़क पर क्यों है?
गाय बीच सड़क पर क्यों है?
पुल पर बैरिकेड क्यों नहीं है?
इन सवालों का जवाब अफसरों से मत पूछिए।
अभी हाल में तीन पुलिसवाले पुल से गाड़ी समेत नदी में गिर गए।
बैरिकेड नहीं था।
अब बताइए—जब पुलिस ही डूब जाए, तो किसे गिरफ्तार करेंगे?
पुल को? गड्ढे को? या बैरिकेड की आत्मा को?
यह देश हादसों से नहीं, हत्याओं से भरा है।
बस फर्क इतना है कि हत्यारे का नाम “सिस्टम” है।
और सिस्टम इतना चालाक है कि हर खून को “प्रारब्ध” बना देता है।
आज कोई और मरा है।
कल बारी आपकी भी आ सकती है।
गड्ढा इंतज़ार कर रहा है।
गाय इंतज़ार कर रही है।
पुल की दरारें इंतज़ार कर रही हैं।
इसलिए अगली बार अख़बार में पढ़ें—
“सड़क हादसे में युवक की मौत।”
तो कहना—
“यह हादसा नहीं, हत्या थी।”
और हत्यारा?
हत्यारा है—वही सिस्टम, जो टोल तो लेती है, लेकिन सड़क पर ध्यान नहीं देती है।
आर के भोपाल।