Hindi Quote in Blog by Ranjeev Kumar Jha

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क्या प्रेम सचमुच ‘अनपढ़’ होता है?
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प्रेम उस सरिता की तरह है, जो पर्वतों से उतरकर समतल में बहती है। पर्वत की ऊँचाई उसे नहीं रोक पाती, घाटी की गहराई उसे नहीं थाम पाती। उसका प्रवाह शिक्षा के शिलाखंडों से टकराकर भी अपनी राह बना लेता है।

मनुष्य के जीवन में शिक्षा दीपक की तरह है, जो अंधकार मिटाती है। पर प्रेम? प्रेम तो उस चाँदनी की तरह है, जो बिना दीपक के भी दिलों के कोनों को उजाला देती है। कितने ही घर-आँगन देखे गए हैं, जहाँ शिक्षित और सफल पुरुष अपनी अपेक्षाकृत ‘अनपढ़’ पत्नी को वैसे ही हृदय से स्वीकारता है, जैसे समुद्र छोटी-सी नदी को अपनी गोद में समा लेता है। उस स्त्री का मौन सहयोग, उसकी निष्ठा और संस्कार—वो जलधारा हैं, जिनसे पुरुष की सफलता की फसल हरी-भरी होती है।

लेकिन जब समीकरण उलट जाता है—एक शिक्षित, स्वावलंबी स्त्री का विवाह किसी कम पढ़े-लिखे पुरुष से होता है—तो वही बंधन दरारें लेने लगता है। स्त्री को वहाँ बौद्धिक संवाद की प्यास खलती है। जैसे कोई पक्षी ऊँचे आकाश में उड़ना चाहता हो, पर साथी की पंखों की शक्ति उतनी न हो। समाज की रूढ़ियाँ और मान्यताएँ भी इस खिंचाव को और गहरा कर देती हैं।

यहाँ एक शाश्वत मनोवैज्ञानिक सत्य है—स्त्रियाँ नैसर्गिक रूप से सबल पुरुष की ओर आकृष्ट होती हैं। यह सबलता केवल बाहुबल नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, नेतृत्व और सुरक्षा का आश्वासन है। ठीक वैसे ही जैसे लता वृक्ष के सहारे ऊपर चढ़ती है, वैसे ही स्त्री उस पुरुष की ओर झुकती है, जिसमें उसे अपने जीवन का आधार दिखता है। शिक्षा वहाँ गौण हो जाती है, और व्यक्तित्व की आभा निर्णायक बनती है।

फिर भी, यह विरोधाभास हमें बार-बार उलझाता है। पुरुष का अहं कई बार रिश्ते को ढाल की तरह बचा लेता है, जबकि स्त्री की आकांक्षाएँ उसे बंधन से दूर खींच ले जाती हैं। एक ओर परंपरा की गहरी जड़ें हैं, दूसरी ओर आधुनिक चेतना के पंख।

तो क्या प्रेम अनपढ़ है? हाँ, प्रेम अनपढ़ है—क्योंकि वह किसी पाठशाला में नहीं जन्मता, किसी किताब में नहीं पलता। वह तो जल की तरह है—जहाँ राह मिलती है, बह निकलता है। वह दीपक और चाँदनी दोनों हो सकता है, वह पर्वत की चोटी और घाटी का सन्नाटा दोनों हो सकता है।
सच्चा प्रेम शिक्षा और सामाजिक मानकों से परे होता है—वह आत्माओं का संवाद है, हृदयों का मिलन है। और जब तक भरोसा, सबलता और भावनात्मक साझेदारी बनी रहती है, तब तक प्रेम हर डिग्री से ऊँचा और हर किताब से गहरा ठहरता है।
आर के भोपाल।

Hindi Blog by Ranjeev Kumar Jha : 111997159
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