"इश्क़ का तज़्किरा"
तुझे तलाशती हूँ आफताब के उजालों में कहीं,
कभी इस तन्हा सी महताब की मशालों में कहीं।
किसी कश्मकश में उलझी हूँ कुछ जवाब पाने को,
तू शामिल है मेरे ज़र्रे ज़र्रे में उलझें सवालों में कहीं।
जिसे हुआ करती थी कभी मोहब्बत सादगी से,
वो भी फंस के रह गया अब इन जमालों में कहीं।
मेरी निगाह ने देखा तुझे ख़्वाब के सफ़र में,
मेरी तलब ने पकड़ा तेरा दामन ख़यालों में कहीं।
मुझे यक़ीं है तू होगा मेरी दुआ के साए में,
छुपा हुआ है शायद रहमतों के क़ाफ़िलों में कहीं।
मैं अपनी तिश्नगी को भी तेरे नाम पे रख आई,
मिला है सुकून मुझको तेरे ही हवालों में कहीं।
"कीर्ति" ने हारकर भी मोहब्बत का दामन थामे रखा,
लिखा है उसका तज़्किरा भी इश्क़ के कमालों में कहीं।
Kirti Kashyap "एक शायरा"✍️
आफताब = सूर्य, सूरज
महताब = चाँद, चन्द्रमा
जमालों = सुंदरता, खूबसूरती
तिश्नगी = प्यास, तड़प, चाहत
हवालों = जुड़ाव, सहारा
तज़्किरा = ज़िक्र
कमालों = अद्भुत बातें, बेमिसाल खूबियाँ