"आज की राजनीति…
क्या सच में देश के हित में है,
या हम बस परछाइयों के पीछे दौड़ रहे हैं?
कभी किताब के पन्नों में अंबेडकर मिलते थे ,
अब चौक-चौराहों पर उनकी तस्वीर है ,
पर उनका लिखा संविधान…
मज़ाक सा बना दिया गया है।
मीडिया की कलम भी अब बिक चुकी है,
और स्याही भी उसी की है जो सत्ता देता है।
शायद मैं अकेला ही हू ,
जो खुले बाज़ार में मरना पसंद करुंगा ,
पर अपनी कलम की गुलामी…
कभी स्वीकार नहीं करुंगा । "