समस्याओं से जूझता युवा,--
युवा चाहता है यदि कुछ करना, अभाव आंधी से पड़ता है लड़ना।
गांव में कृषि अब पर्याप्त नहीं, शिक्षा दीक्षा का व्यवहारिक व्यवहार नहीं,स्वयं युवा को दर-दर भटकना पड़ता।
रोजी-रोजगार नहीं, व्यवसाय व्यापार नहीं,युग युवा को रोटी की खातिर सिमटना पड़ता।
गांव छोड़कर शहर, शहर छोड़कर राज्य,राज्य छोड़ प्रवासी बन पहचान गवाना पड़ता।
माँ-बाप की आशाओं, प्यार, परवरिश,परिवार की आकांक्षाओं से मुंह छुपाना पड़ता।
युवा आज भी ओज, तेज, ऊर्जा का परिपूर्ण,विवश हो खो जाता युग आंधी में, पीठ दिखाना पड़ता।
युग युवा आशा और विश्वास की जलती होली,रोज जीवन की खुशियों के रंगों से बदरंग हो जाना पड़ता।
युग युवा धैर्य, धीर, वीर, गंभीर,
रच डाले हैं जाने कितने ही इतिहास, तुम्हें ही शक्ति, साहस है, चाहो जैसा बदल डालो समय, काल, वर्तमान।
युग युवा की हताशा, निराशा से देश, समाज बीमार,उठो, जागो, युग चेतना के प्रवर्तक, पुकारता समय काल।
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।