विरह --
छोड़ गए जबसे जीवन विरान हुआ, विरह वेदना में गुलशन उजाड़ हुआ।
पल पल खुशबू का मधुबन मौसम कुछ उदास हुआ, रिम झिम सावन की फुहार।
तेरा शर्माना सावन की घटाओं जैसे जुल्फों में चाँद से चेहरे का छुप जाना, बस यादों का ही हुआ।
खुशियां कब आईं चली गईं जिंदगी खुशियों यादों का इंतजार हुआ।
शायद फिर दुनिया में मेरे आ जाए बहार, उम्मीदों का ही साथ हुआ।
राह निहारू संदेशा भेजूं दिल की गहराई से देता हूं आवाज, जीवन केवल विश्वास हुआ।
सांसों धड़कन का राज आ जा बची हुई कुछ आस, सांसों धड़कन भाव बिहीन मात्र
आवाज हुआ।
बीराने सुने मन में अब बसता नहीं भगवान, तेरे जाने से भाग्य समय काल भगवान भी रूठा, जीवन निष्प्राण हुआ।
सुख वैभव सब है दुनिया में मौसम भी मधुमास भी, तेरे ही न होने से मौसम गम साथ हुआ।
बारिश का पानी कागज की कस्ती बचपन अंजाने का नाम हुआ।
प्यार जाने कब एहसास हुआ जीवन का गुजरा व्यवहार हुआ।
तुमने भी जीवन के ख्वाब सजाए जाने कितनी कसमें खाईं, कसम तोड़ दिए सारे, भूल गए प्यार के रस्म सारे, प्यार मेरा जमाने का परिहास हुआ।
दिल दुनिया दामन किस्मत खुशियां शीतल चाँद चांदनी सावन की सर्द सुहानी हवाएं वसंती बयार बीते सपनों का संसार हुआ।
तेरे ही न होने से मेरी दुनिया में दर्द बहुत, जीवन की हर खुशियां मौसम जैसे बेजान हुआ।
नंदलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश!!