ये बादल छम-छम आए है
जब महादेव मुस्काये है।
देवो में देव निराले है
शिव शंकर डमरू वाले है।।
भांग का भोग लगाते है
ये मस्त मगन हो जाते है।
भस्मी का तिलक लगाते है
ये काशी में बस जाते है।।
तन पर मृग की ये छाल लिए
मुख मण्डल में ब्रम्हांड लिए।
काशी का भार उठाते है
ये नीलकंठ कहलाते है।।
हर-हर शम्भु के जयकारे से
माँ पार्वती के नारे से।
मणिकर्णिका के अंगारे से
शिव मृत्युंजय कहलाते है।।
काशी के नाथ कहाते है
भक्तों के पाप मिटाते है।
ये विश्वनाथ कहलाते है
भूमंडल पर छा जाते है।।
महाशिवरात्रि के शुभ अवसर पर आप सभी को बाबा विश्वनाथ का आशिष प्राप्त हो।
मीरा सिंह