कुछ कहा ही नहीं...
चाँद भी पूछे तेरा पता क्या,
हवा भी रोए, कोई गिला क्या?
तू था मेरा या बस मेरा वहम,
ख़्वाबों में आया, फिर चला क्या?
तूने कुछ कहा ही नहीं,
मैंने फिर भी चाहा तुझे…
बिन बात के रूठी रही,
तेरी ख़ामोशी सहा तुझे…
रातें कटीं तेरी यादों में,
दिल की गलियाँ वीरान सी…
शबनम भी पूछे इन फूलों से,
क्यों सूखें अब अरमान भी?
तूने कुछ कहा ही नहीं,
मैंने फिर भी चाहा तुझे…
बिन बात के रूठी रही,
तेरी ख़ामोशी सहा तुझे…
कभी जो मिल जाएँ राहों में,
कहूँ या चुप रह जाऊँ मैं?
तेरी नज़रों में सवाल हैं जो,
उनसे जवाब ले आऊँ मैं?
तेरी ख़ामोशी, मेरा जुनूँ,
फिर भी तेरा इंतज़ार क्यूँ?