नज़्म: "शब्दों की ख़ामोशी"
कुछ लफ्ज़ दिल के कोने में यूँ ही सो गए,
बेवजह, बेमकसद, खामोश हो गए।
जो कहना था, वो कहा नहीं,
जो सुनना था, वो सुना नहीं।
चाँदनी रातों में जो ख्वाब बुनते थे,
वो अब वीरानों में खो गए।
जो एहसास कभी नाम मांगते थे,
वो अब सिर्फ़ किस्सों में रह गए।
दिल की किताब में कुछ सफ़हे खुले,
पर उन पर कोई हर्फ़ नहीं।
जो अश्क बहकर कहानी कहते थे,
वो अब आँखों में दर्ज नहीं।
शब्द भी हैं, खामोशी भी है,
पर दोनों के बीच एक सन्नाटा है।
जो ग़ज़ल कभी धड़कनों से निकली थी,
अब बस दीवारों से टकराता है।
~ लोकेश