चश्मे का रहस्य
एक दिन रमेश जी अपने घर से बाहर निकल रहे थे, तभी उनके दोस्त मोहन ने देखा और चिल्लाया, "अरे भाई, तूने चश्मा क्यों नहीं पहना?"
रमेश जी थोड़े सोच में पड़े, फिर बोले, "यार, चश्मा तो मेरे पास है, लेकिन आजकल लगता है कुछ खास काम नहीं करता।"
मोहन हैरान होते हुए बोला, "क्यों, ऐसा क्या हुआ?"
रमेश जी मुस्कराए और बोले, "देख, जब से चश्मा पहना है, तब से तो घर में सब मुझे 'स्मार्ट' समझने लगे हैं। पर असली सवाल यह है कि क्या मेरा चश्मा मुझे स्मार्ट बना सकता है या फिर मेरी सारी समझदारी इस चश्मे में फंसी है?"
मोहन हंसी रोकते हुए बोला, "तू सच में कभी न समझेगा, तेरे चश्मे का रहस्य यह है कि तेरी दिमागी उड़ान सीधी चश्मे के अंदर जाती है, वहां कुछ 'स्मार्टनेस' जमा हो जाती है।"
रमेश जी ने तुरंत चश्मा उतारा और बोले, "अब यह तुझसे समझकर मुझे लगता है कि यह चश्मा मेरे दिमाग की पूरी की पूरी नजरें बदल सकता है! शायद अगली बार इसे किसी और पर लगा दूं, ताकि मुझे ज्यादा स्मार्ट दिखाई दे।"
दोनों जोर से हंसी में टूट पड़े और दिन भर एक दूसरे को चश्मे के नए 'रहस्यों' पर हंसी मजाक करते रहे।
इस तरह, एक साधारण चश्मा और दो दोस्तों के बीच की बात ने पूरे दिन को हास्य से भर दिया!