माना कोई भी रिश्ता जुड़ना,
वह उपरवाले के हाथ में है,
मगर वह रिस्ते का टिकना,
वो तो हमारे हाथ में है ना ?
मालूम नहीं फिर भी कुछ लोग,
उपरवाले की पसंद को,
उपरवाले की मर्जी को,
ठुकराते क्यों है ?
क्या उन लोगों को इश्वर का डर नहीं लगता होगा ?
या फिर,
उन लोगों को इश्वर के डर से ज्यादा,
उनकी चालाकी पे ज्यादा अभिमान हो गया होगा ?