नैनीताल-१८
सपने का एक टुकड़ा
मुझे गिरा मिला
उससे आवाज आ रही थी,
नाविक बोल रहा था
इस झील की गहराई का पता नहीं,
मल्लीताल की नावें
अब तल्लीताल नहीं आती हैं,
तल्लीताल की नावें
मल्लीताल नहीं जाती हैं,
झील एक है
पर नौका विहार दो हैं,
महाविद्यालय का स्नेह
खड़ा का खड़ा है
बैठे का बैठा है,
जो हुआ सो हुआ
उसे कैसे नकारूँ,
अदृश्य साथ को कैसे निभाऊँ,
जो मन में है
वह ईश्वर सा हो गया है
अलौकिक,अटपटा,
पर सुगंध धरती से आ रही है,
अब जब जागूँगा
कुछ शब्द, कुछ स्वर
फिर से कह आऊँगा,
पुराने में नया रूप धर
मन को बिखेरते जाऊँगा।
*** महेश रौतेला