Hindi Quote in Shayri by JUGAL KISHORE SHARMA

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आहिस्ता आहिस्ता हालतों पे मारे होते,
रात होती राहिद ना चाँद सितारे होते।

बुत ए सफा जंग थी,हार तुम कहते हो,
जिन्दा होते तो नजारे ही नजारे होते ।

ये जो आँसू हैं, मेरी पलकों पे पानी जैसे,
गम ए सूद ऑ जिया हमी बेसहारे होते ।

जो हम लोग हैं, एहसास में जलते हुए,
हमज़मीं ज़ाद न होते तो ख्वाबशारे होते।

तुमको इंकार हादी यू मार गई है शायिद,
हर मुरशीद से न उलझते तो किनारे होते।

जिन फ़िज़ाओं में तेरी याद का आलम होता,
हवाओं में मुज्जाहिद गर हमभी गुज़ारे होते।

आज दरिया में जो गहराइयाँ हमने देखीं,
तुम भी होते तो किनारे ही किनारे होते।

उसके क़दमों पे बिछी है जो ये धूल, सुनो,
वो भी मुझमें कहीं हसरत इल्तजाकारे होते।

सिर्फ़ ख़्वाबों में ही हमने इश्क़ को पाया है,
वरना चाहत के सफ़र में वो कारगुज़ारे होते।

तेरी राहों में जो बिछते हैं ये फूल सारे,
उनमें कांटे भी सजीले तो तर्जुमकारे होते।

क्या कहें हाल-ए-जहाँ, दर्द का फ़नकार है,
लफ़्ज़ बिखरे तो गुलिस्तां में तफरीकारे होते।

तुझसे मिलना ही मुकद्दर था मेरे इश्क़ का,
वरना रस्ते तो अंधेरों के इबरतकारे होते।

दिल की राहों में कोई और भी होता अगर,
ये जज़्बात भी शायद खुद से प्यारे होते।

वक़्त ने हमको सिखाया है तुझे भुला देना,
वरना यादों के दरीचों में मश्वराकारे होते।

चाँद की रोशनी में वो शबाब का आलम,
काश हम सबही उसके फतवाकारे होते।

उनके ख़्वाबों में जो बेचैन सी आहट थी,
वो भी सन्नाटों के लम्हों में सहारे होते।

रूह बेचैन थी, दिल भी बहुत मायूस था,
तुझसे पहले ही अगर प्यार गुज़ारे होते।

हवाओं को भी मोलाहिद यु पुकारा मैंने,
काश लफ्ज़ों के समंदर में किलकारे होते।

मुझे क्या हक़ कि मैं उसको बुलाऊं वापस,
अगर चाहत में तेरे येदांव तिशमारे होते।

वो जो शामों की सियाही में तेरी याद आई,
काश उस रात सितारों के दिलबरो होते।

हम जो टूटी हुई आवाज़ के साथी थे कभी,
तेरे पहलू में वो गुज़रे हुए वक़्त संभारे होते।

हुस्न की चाह में जो रातें जलाईं हमने,
काश उन शम्मों में महबूब खताखारे होते।

दिल से महसूस किया हमने तेरा दर्द ए हयात,
अगर चाहत में कुछ और वकालागारे होते।

मेरा हर एक फैसला तुझसे मुहब्बत में था,
रोज़े-महशर पे अगर वस्ल के नज़ारे होते।

शेरों में जो नज़ाकत और हुस्न का दीदार है,
उनमें अशआर में वो लहजे भी दरबारे होते।

दिल की दीवार पे लिखा था तेरा नाम सनम,
काश महफिल में वो रंगीन राहबारे होते।

मोहब्बत की जो किताबें हमने दिल से पढ़ीं,
उनके लफ़्ज़ों में कभी तेरे किनारे होते।

ग़ज़ल जो बयानात हैं, हक़ीक़त इशारे होते,
दानिस्ता काश हम-तुम भी जखिरकारे होते।
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लोकः समस्ताः सुखिनो भवन्तु में समाहित सहज सनातन और समग्र समाज में आदरजोग सहित सप्रेम स्वरचित - आदर सहित परिचय मैं जुगल किशोर शर्मा, बीकानेर में रहता हूॅं लेखन का शौक है मुझे स्वास्थ्य,सामाजिक समरसता एंव सनातन उद्घट सात्विकता से वैचारिकी प्रकट से लगाव है, नियमित रूप से लिंक्डिंन,युटूयूब,मातृभारती, अमर उजाला में मेरे अल्फाज सहित विभिन्न डिजीटल मीडिया में जुगल किशोर शर्मा के नाम से लेखन कार्य प्रकाशित होकर निशुल्क उपलब्ध है समय निकाल कर पढें

Hindi Shayri by JUGAL KISHORE SHARMA : 111954327
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