सुख यहीं,दुख यहीं
यहीं तो ये संगम बना,
स्नान यहीं,स्थान यहीं
यहीं तो रिश्ता हुआ।
जो दो-चार बरस मिले
वे सब नश्वर हुये,
तुम्हारी बातों के लिए
तुम्हें तो युवा युग मिले।
यहीँ समुद्र पारकर
हमें घर मिल गया,
यहीं द्वेष छोड़कर
हमें स्नेह मिल गया।
सुख यहीं,दुख यहीं
यहीं तो ये संगम बना,
स्नान कर इसमें सदा
हमें मोक्षबल यहीं मिला।
मैं लूट भी इसे कहूँ
मैं छूट भी इसे कहूँ,
अमृत भी पीने लगूँ
विष भी निगलने लगूँ।
* महेश रौतेला