कानून मददगार
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क़ानून युही मददगार,ज़ुल्म ए इनाम है,
साये में तख़्त ये ऊँचे काहे मक़ाम है।
दफ़्तर की सियाही में धुंधलाती हैं रौशनियाँ,
हवाओं में घुलते फ़रेब ओ रूबाब शाम हैं।
कहाँ हैं वो हाथ जो खींचें हमें वबाल से,
हर क़दम पर जैसे लुटते हुए अंज़ाम हैं।
बनते थे जो रक्षक, अब हैं वो दाग़-दार,
हर मोड़ पर फ़रेबी ज़माने ये आसाम हैं।
ख़्वाबों के सौदागर भी अब जाल बुनते हैं,
क़लम की नोक पर घावों के क़िस्से आम हैं।
खींजां ने बग़ावत ए हवा है इस ज़मीं पर,
हर शाख़ पर बस बेवफ़ाई के पयगाम हैं।
सिक्कों की खनक ओ ये डूब गई हैं आवाज़ें,
वक़्त की साज़िशें हर तरफ़ नफ़रतें तमाम हैं।
वो फ़ज़ाओं की सुगंध भी अब खो चुकी वो,
हर रुख़ पर मुफ़लिसी के रंज़ इल्ज़ाम हैं।
जहाँ दस्तूरों को न कोई न जाने सवालात़ है,
तहक़ीक़ में जो झूठ है, बस वही इम्तिहान हैं।
क़लम के जुमले अब सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी से हैं,
जहाँ हक़ीक़तों के जवाब सिर्फ़ अरमान हैं।
उनकी निगाहों में हमने ख़ुददी को खोया,
आईनादार अब तो भी सब ग़रीब इंसान हैं।
इंसाफ़ की नाक़ाम गूँज में बस सन्नाटा है,
जहाँ सच्चाई की राहों पर हर तरफ़ दांग हैं।
तहक़ीक़ का सफ़र जब भी शुरू होता है,
हर फ़साना अधूरा और सियाह फ़रमान हैं।
जो बैठते हैं तख़्त पर, मासूमों से दूरी बनाके,
वहीं पर होते बेगुनाहों के अनजान निशान हैं।
आँखों में है परछाईं अब भी उस रोशनी की,
जो खो चुकी फ़रेब में और मुश्किल इम्तिहान हैं।
जब हक़ उठता है, चुप्पी से सबाब आता है,
मसला है कि अबहर और घुटन घबराहट हैं।
बातों में खामोशी का कुछ आलम ऐसा है,
जहाँ हक़ीक़तों के इरादे सिर्फ़ नागवार हैं।
कौन देखेगा उन राहों को जिनमें ख़ुलूस नहीं,
सियासत ए आग में हर ओर धुएँ के निशान हैं।
जो लड़ते थे कभी उसूलों की बातों पर,
फ़रेब की हर सुबह और शाम में जाम हैं।
लम्हे के क़ैदख़ानों में टूटते हैं ख़्वाब जैसे,
वही ख़्वाब अब सिर्फ़ मुक़द्दर के बयान हैं।
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सविनय और सप्रेम
स्वरचना-जुगल किशोर शर्मा
बीकानेर 9414416705