अभी अभी मैं पानी था
अभी अभी हवा बना हूँ
अभी अभी पिया गया
अभी अभी सांसों में हूँ।
कभी कभी प्यार में हूँ
कभी कभी आग बना हूँ,
कभी कभी खेतो में हूँ
कभी कभी वृक्षों में हूँ।
लौटकर देखूँ तो
तक्षशिला, नालन्दा हूँ,
अतीत के पन्नों से
प्रस्फुटित फिर होने को हूँ।
*** महेश रौतेला