दोहा - कहें सुधीर कविराय
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रावण
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आज राम जी मौन क्यों, देते नहि अब ध्यान।
उत्पाती रावण करे, बढ़ चढ़ नित गुणगान।।
रावण अब मरता नहीं,कितने मारो बाण।
रावण जिद पर है अड़ा, नहीं छोड़ता प्राण।।
वह रावण जो था मरा, अब उसका क्या गान।
घर घर रावण कुछ बसे, कैसा बना विधान।।
मर्यादा लुटती रहे, आँखें रहतीं बंद।
रोती रहती यह धरा, हँसते है छल छंद।।
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पावन
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पावन जिसका नाम है, और अयोध्या धाम।
मर्यादा की सीख दे, कहते उसको राम।।
रिश्ता भाई बहन का, पावन और पवित्र।
सभी चाहते हैं सदा, बना रहे ये चित्र।।
पावन जब तक आपका, रिश्तों का आधार।
मर्यादा की छांव में, बना रहेगा प्यार।।
पावन जिनका नाम है,बसे अयोध्या धाम।
मर्यादा की सीख दे, कहें उन्हें हम राम।।
गंगा मैय्या पावनी, मान रहे हम आप।
हम ही मैली कर रहे, करते कैसा पाप।।
सबके मन को कीजिए, प्रभु जी पावन आप ।
धरती पर नहि हो कभी, किसी तरह का पाप।।
पावन मेरा नाम है, और सुघड़ सब काम।
फिर भी कोई प्यार से, लेता कब है नाम।।
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मित्र, मित्रता
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मित्र आप हैं जानते, किसको कहते मित्र।
खींच सके जो आपका , जैसा होये चित्र।।
सोच समझ कर कीजिए, आज मित्रता आप।
कहीं मित्र ही नहि बने, जीवन का अभिशाप।।
कभी मित्र के मध्य में, उठे नहीं दीवार।
जब तक मन में मित्र के, जन्म न ले कुविचार।।
आज मित्रता हो रही, स्वार्थ छिपाकर यार।
मित्र भागता दूर है , करके बंटाधार।।
आज मित्रता का दिवस, खुश रहना तुम मित्र।
मेरी भी है कामना, अति सुंदर हो चित्र।।
हर रिश्ते में हो सदा, मित्रों जैसा भाव।
सच मानो तब मित्र के, दिखे न कोई घाव।।
भ्रात बहन की मित्रता, बनती सदा मिसाल।
अब तो आपस में लड़ें, आंख दिखाते लाल।।
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सूझ बूझ
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हल हो जाते हैं सभी, सबके सारे कष्ट।
सूझ बूझ से काम लो,होगी मुश्किल नष्ट।।
सूझ बूझ से ही करें, अपने सारे काम।
मिल जायेंगे हल सभी, और मिले आराम।।
सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा उत्तर प्रदेश