बसंत फिर-फिर आयेगा
सुगन्ध अपनी लायेगा,
मैं खड़ा रह जाऊँगा
बसंत कहीं छुप जायेगा।
वृक्ष ये कहने लगेगा
बसंत को गिनने लगेगा,
मन मेरा उदार होकर
खुशी-खुशी गाने लगेगा।
हवा सर्वत्र बासंती हो
आकाश पर छाती रहेगी,
ठंड को यों विदा कर
गुनगुनी ये धूप होगी।
मधुरता की राह पर
बसंत पर इठलाऊँगा,
यों ठंड को चीरकर
हर फूल पर इतराऊँगा।
* महेश रौतेला