नैनीताल( एक लघुकथा)-८
झील के किनारे बैठ
सोच रहा हूँ
मैं बूढ़ा युवक हूँ,
तो वह बूढ़ी युवती हो चुकी होगी,
पत्र लिख
झील में बहा देता हूँ,
आँखों की रोशनी से
दूर तक देख लेता हूँ,
उसकी छाया को
दूर से पहिचान लेता हूँ।
चलते-चलते रुका,ठिठका
सोचा "प्यार भी तो साधु ही है"
अब तक प्यार की आग मुझे तपा चुकी थी
वृक्ष मौन थे
लेकिन हवा से हिल रहे थे।
नल का ठंडा पानी
अपनी प्रकृति में बह रहा था,
सूखे पेड़ों की लकड़ी जल रही थी,
दोस्त पत्र लिख रहा था
मन की चोटों को गिना रहा था,
जो मुझमें था
वह उस पर हँस रहा था,
जो उसमें था
मैं उसे काट रहा था,
फिर जो सत्य निकला
यादों में उसे छुपाकर
वर्षों बाद खोला
जो हीरे सा चमक रहा था।
भजन हमारे एक ही थे
बसंत भू का सबका था,
थोड़े दिन की पहिचान हमारी
हर क्षण मन को छूती थी,
संग में होना वरदान सूक्ष्म था
नाराजगी सभ्य बहुत थी।
ईश्वर यों तो घट- घट है
पर मेरा परिचय बहुत नहीं है,
कहने को बहुत नहीं है
पर हर संग का उधार बहुत है।
** महेश रौतेला