अब क्या बताए हाल इस दिल का,
कोई समझ पायेगा क्या?
अब कैसे काटे हर एक रात,
उसे मैं भुल पावुंगा क्या?
अब पता नहीं क्यू,
थोड़ीसी खुशी ढूंढ लेता हूं मैं,
उसके साथ दो पल रहने की।
अब पता नहीं क्यों,
थोड़ी थोड़ी कोशिश भी करता हूँ मैं,
रोज रोज थोड़ा उसे भूलने की।
मेरी कोशिश, कभी
पूरी हो जायेगी क्या?
जिससे भागता हुं दुर वो,
उसकी याद मिट जायेगी क्या?
पर अब मजा आने लगा है,
उसकीं यादोमें खो जानेमे,
अब मन झुम उठता है,
उसके साथ दो कदम चलनेमे।
मेरे दिल की ये कशमोक्श,
वो समझ जाति है क्या?
जितनी वारी टूटा है दिल मेरा,
वो आके जोड़ पायेगी क्या?
ऐसे सारे" क्या "का जवाब,
कभी तो उसको देना होगा.
जते समय मैं दुर उसके,
थोड़ा दुख उसे भी सहना होगा।
देना नहीं चाहता दुख उसको पर,
लगता है यही हमारी नियति है.
कुछ बाते उसको समझे बिना हो जाये,
क्या ऐसी ही मेरी प्रीति??
-विनायक....