त्रासदी
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भीतर से
असहज होते मन
सिल्ली से
होते जा रहे हैं
पीड़ा की तिजोरियाँ
भरी जा रही हैं
निकास का न कोई
इरादा लगता है
न ही मार्ग
मासूम बच्चों
शिथिल वृद्धों
असुरक्षित यौवन
क्षुधित उदर
और क्या कहर ढाएगा?
ऐसे में साँसों की बीन
जिन क्रूर सपेरों के
हाथों में है
वे कैसे काटे जाएंगे?
कैसे इंसान ले सकेंगे
खुली खिली साँस
कब चार दिन का
समझ आएगा अर्थ
बुद्धि कुंद हो गई
दृष्टि बिंध गई
होने न होने की
आशंका
बनकर खड़ी है
विभीषिका!!
डॉ. प्रणव भारती
😥