काश तुम आकर गले लगा कर कह दो,
"हूं मैं तुम्हारे लिए
रहूँगा मैं तुम्हारा सदा "
यक़ीन मानो,
उन चंद लफ़्ज़ों का सहारा बहुत है
मुझे जीने के लिए
लेकिन मेरी क़िस्मत में,
ना ही तुम हो
ना ही तुम्हारे वो चंद अल्फाज़
कुछ है,तो वो सिर्फ तुमसे मोहब्बत करना
और तुम्हें ना पाने का दर्द सहना!
जो ना तो ढंग से जीने दे रहा
ना ही मरने दे रहा…
क्यूँ मैं जो ख़्वाब देखती हूं
वो मुकम्मल नहीं होते?
सबकी तरह मेरी मोहब्बत के किस्से
पूरे नहीं होते?
अधूरी सी होके रह गई हूं मैं
अधूरे हैं अब मेरे ख़्वाब!
नहीं मांगती अब दुआओं में
मैं कुछ भी
ना तुम्हें, ना ख़ुद को
और ना ही अपने लिए सवाब!