घर घर वीणा बजती है
सुनना है तो सुन लो बन्धु,
किस पते पर मैं रहता हूँ
किस पते पर तुम रहते हो?
पूछना है तो पूछ लो बन्धु।
सुबह हुई है आँखें खोलो
हिमगिरि पर सुन्दर नृत्य हुआ है,
गंगा के आगे भीड़ खड़ी है
सावन कितना मस्त हुआ है।
वह जो इससे दूर खड़ा है
इस माटी का प्राण रहा है,
पहिचान अपनी खो जाने का
उसको कितना भय रहा है?
उड़़ जा जैसे पंछी उड़ते
इस धरा को पता बना ले,
अन्दर बाहर कुछ तो अन्तर
अपनी पहिचान स्वयं बना ले।
* * महेश रौतेला