मैं गुजरात में हूँ। बाहर तूफान है।जिसका नाम है बिपरजाँय है। तूफान से मन कह रहा है-
"सुर तो तेरा बदला है
तू किससे मिलकर आया है?" बादल ऊपर नीचे हो रहे हैं। बिजली नहीं चमक रही है अतः तड़ित चाल की भयंकर ध्वनि भी नहीं है। तेज हवा है। रूक-रूक कर तेज बारिस हो रही है। सीटी सी आवाज इधर-उधर से आ रही है। साथ में साँय-साँय की आवाज। वृक्षों को हवा नचा रही है। कुछ पेड़ टूट गये हैं, कुछ उखड़ गये हैं। समुद्र तटीय स्थानों में क्षति अधिक है। तापमान जहाँ इस समय ४४-४५ डिग्री सेंटीग्रेड रहता था वह ३०-३२ पर आ गया है। अब तूफान राजस्थान की ओर जायेगा, अपनी चाल धीमी कर। कुछ दिन पहले श्रीनाथजी मन्दिर गया था। रास्ते में श्यामला जी मन्दिर भी पड़ता है। वहाँ धरती पर पैर रखना कठिन था, इतनी गरम थी धरती। मुझे जागेश्वर मन्दिर याद आ गया जब पूस माह में मन्दिर के पत्थर इतने शीतल थे कि पैर रखना कठिन हो रहा था।
श्रीनाथद्वारा मन्दिर में कुछ कठिननाई लगी। अतः मन्दिर व्यवस्थापकों को लिखा-
"आदणीय महोदय,
मैं २१.०५.२३ की शाम श्रीनाथद्वारा जी मन्दिर में दर्शन के लिए गया। पहले तो लोग पंक्ति में चलते हैं लेकिन दर्शन के समय( अन्त में) भक्तों की भीड़ अनियंत्रित हो जाती है। और दृश्य अच्छा नहीं लगता है। मैं सोमनाथ के मन्दिर भी दो बार गया हूँ। वहाँ लोग अन्त तक व्यवस्थित और गरिमामय रहते हैं। अत: आप से अनुरोध है कि वही व्यवस्था श्रीनाथजी के मन्दिर में भी लागू करें तो गरिमापूर्ण दर्शन हो सकेंगे। सकारात्मक व्यवस्था की आशा में।
आदर के साथ।"
मैं बूढ़े को फोन पर ये सब बताता हूँ। बूढ़ा कहता है झील भी जब अशान्त होती है तो डर लगता है। तूफान तो तूफान ही है।