🦋...SuNo
निकला जब भी इस शहर में कमरे
से मैं बाहर निकला,
मेरे स्वागत को हर एक जेब से
खंजर निकला ।
तितलियों फूलों का लगता था जहाँ
पर मेला,प्यार का गाँव वो बारूद
का दफ़्तर निकला ।
डूब कर जिसमे उभर पाया न मैं
जीवन भर,एक आँसू का वो कतरा
तो समुंदर निकला ।
मेरे होठों पे दुआ उसकी जुबाँ पे
ग़ाली,जिसके अन्दर जो छुपा था
वही बाहर निकला ।
ज़िंदगी भर मैं जिसे देख कर
इतराता रहा,मेरा सब रूप वो मिट्टी
की धरोहर निकला ।
वो तेरे द्वार पे हर रोज़ ही आया
लेकिन,नींद टूटी तेरी जब हाथ से
अवसर निकला ।
रूखी रोटी भी सदा बाँट के जिसने
खाई,वो भिखारी तो शहंशाहों से बढ़
कर निकला ।
क्या अजब है इंसान का दिल भी'
ज़ख्मी' मोम निकला ये कभी तो
कभी पत्थर निकला...🥀🖤
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➛ ज़ख्मी 💔 दिल•••🥀
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