सादर समीक्षा हेतु प्रस्तुत है,एक सजल 🙏🙏🙏
सजल
संविधान का मर्म समझिए ।
मानवता का धर्म समझिए।।
हँसी खुशी से जीना सबको,
कर्तव्यों से कर्म समझिए।
अहंकार से जीवन अकड़े,
उगी दूब का नर्म समझिए।
दिल की गहराई में झाँकें ,
गोरा-काला चर्म समझिए।
विनयशील जीवन को जीना,
जल शीतल या गर्म समझिए।
ऊँचा मस्तक रहे सदा ही,
कभी न आवे शर्म समझिए।
मनोजकुमार शुक्ल मनोज
अप्रैल20 23