मैं तपता दोपहर,तुम सर्दी की धूप हो.
मैं बिना मोसम बारिश,तुम सावन की बूंद हो,
मैं हर रोज टुटता हुआ तारा, तुम सूरज चाँद जैसी हर रोज हो,
मै समुन्दर सा खारा,तुम मीठें पानी की झील हो,
मैं चुभता हुआ काटा,तुम मंदिर में चढने वाली फूल हो.
मैं पैरों में आ जाने वाला कंकड़,तुम पत्थर से बनीं मुरत हो.
मैं बेफिजूल मगरूर,तुम मेरे अंदर का गरुर हो.
मैं सबके तरह मतलबी, तुम मेरी जरूरत हो,
मैं एक छोटा सा तील,तुम नूर जेसी सुरत हो,
मैं बिना मतलब का सवाल,तुम हाज़िर जवाब हो,
मैं अनपढ़ गवांर, तुम मेरे दिल की मूरीद हो,
मैं बेवजह की कविता,तुम कहानी में छुपी सन्दर्भ हो,
मैं पन्नौ में छूप जाने वाला इतहास,तुम हर कड़ी में एक सबूत हो,
मैं खोया हुआ किरदार,तुम हर चरित्र में मसहूर हो,
मैं रेगिस्तान में प्यासा,तुम मरीचिका सा दिखती रहतीं हो
मैं हर किसी के लिए बिगड़ेल,तुम हर रोज बनतीं रहतीं हो
मैं बिखरा हुआ सीसा,तुम किसी और के आंख सजती हो
मैं लीख रहा हूँ तूमपे,तुम किसी और के लिए कलम खरीदती हो,
मैं तूम्हें हर रोज सजाने के लिए सोच रहा था,तुम हो कि कहीं और बिकती हो
मैं तूझे देखने के लिए तरसता था, तुम किसी और लिए अब सवरती हो
अब छोड़ ये सब बाते पन्ना भर आया, तुम भी कलम कुछ भी लिखतीं रहतीं हो