चलो,गुम हो जाते हैं
न तुम मुझे देखो,
न मैं तुम्हें देखूं
बस, एक अहसास बना रहे।
कुछ शुभ्रता तुममें रहे
कुछ शुभ्रता मुझमें रहे,
कुछ स्पष्ट तुम रहो
कुछ स्पष्ट मैं रहूँ।
चलो,अज्ञातवास में चलते हैं
वनों में छुप जाते हैं,
कुछ छाँव तुम लो
कुछ छाँव मैं लूँ।
चलो, लुकाछिपी खेलते हैं
इस खेलनुमा जिन्दगी में,
तुम मुझे ढूंढो
मैं तुम्हें ढूंढूं।
* महेश रौतेला