हम मरी कविता रच देते हैं
हम मरा हुआ लिख जाते हैं,
वे मरा पढ़ते हैं
और मरे होने की प्रशंसा करते हैं।
मरी कविता बहुधा लम्बी होती है
भूत की तरह
उल्टे हाथ-पैर वाली,
डराती है अँधेरे में
उजाले में गायब हो जाती है।
हम जो मरा रचते हैं
साँप सा टेड़ा-मेढ़ा लिखा होता है,
मैंने भी लिखी थी
मरी कविता,मरे लोगों के विषय में।
मरे लोगों का अपना संविधान होता है
मरी कविता की तरह,
आखिर मरा होना भी
कभी-कभी शहीद होने जैसा है।
* महेश रौतेला