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#success
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वादिश्वंनास्त्यमलेत्वयि ।
रज्जसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज ॥
समदुःखसुखःपूर्णआशानैराश्ययोःसमः।
समजीवितमृत्युःसन्नेवमेव लयं व्रज ॥
यावत्स्वस्थो ह्यय देहः तावन्मृत्युश्च दूरतः।
तावदात्महितं कुर्यात् प्रणान्ते किं करिष्यति॥
#जब तक शरीर स्वस्थ है, तभी तक मृत्यु भी दूर रहती है । अतः तभी आत्मा का कल्याण कर लेना चाहिए । प्राणों का अन्त हो जाने पर क्या करेगा? केवल पश्चात्ताप ही शेष रहेगा ।#