Hindi Quote in Quotes by Dr Jaya Shankar Shukla

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"सर्व स्वीकार सहज सिद्धावस्था है|"
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यहाँ हमारा किया हुआ कुछ भी नहीं है, हम भी हमारे किये हुए नहीं हैं|यह कोई और ही खेल चल रहा है|
इसमें द्वंद्व है, निर्द्वन्द्व है|
हम अहंकार के साथ हैं तो द्वंद्व, अहंकार के साथ नहीं हैं तो निर्द्वन्द्व|
या कह सकते हैं अस्वीकार हमारा रुप है तो द्वंद्व, तो हम अहंकारी|स्वीकार हमारा रुप है तो तो निर्द्वन्द्व, तो हम निरहंकार|
कृष्ण कहते हैं-"जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता अर्थात् गुण ही गुणों में बर्तते हैं ऐसा देखता है और तीनों गुणों से परम् को तत्त्व से जानता है उस काल में वह पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है||"
सात्विक, राजसी, तामसी कितनी वृत्तियाँ हैं, फिर रागद्वेष, पसंद नापसंद, अच्छा बुरा लगना-दिन भर यही चलता है|इसमें हमारा किया क्या है, ये सब गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं|
या यह सब मानसिक खेल है जिसे देखा करना है|
यह देखना आसान नहीं है क्योंकि हृदय ग्रंथि मौजूद है|
अस्वीकार रहता है|इसलिए स्वीकार इसका रास्ता है|
मन में जो भी द्वंद्व है उसका स्वीकार|उसका स्वीकार जिससे हमें कुछ लेना देना नहीं है लेकिन अभी स्वीकार की जरूरत है वर्ना हृदय ग्रंथि बनी रहेगी|
अत:सुख है तो स्वीकार, अच्छा लगता है स्वीकार|दुख है स्वीकार, दुख बुरा लगता है स्वीकार|
बुरा लगना स्वीकार नहीं है तो यह भी स्वीकार|हमारे हाथ में एक ही सूत्र है सर्व स्वीकार, सौ प्रतिशत स्वीकार|इसका कारण है इसमें हमारा किया हुआ कुछ भी नहीं है लेकिन इसका पता स्वीकारने से चलेगा, बचने से-छूटना चाहने से नहीं|
क्रोध है स्वीकार, क्षमा है स्वीकार, प्रेम है स्वीकार, घृणा है स्वीकार|घृणा बुरी लगती है स्वीकार|सबका स्वीकार|और कुछ करने को नहीं है|यह मुक्ति है, यह द्रष्टा भाव है, यह सहज स्वरूप में स्थिति है|यह जड चेतन में पडी ग्रंथि का विलीनीकरण है|
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Hindi Quotes by Dr Jaya Shankar Shukla : 111836774
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