उदाहरण के तौर पर एक जिले को चुन कर उसके गरीबी एंव सरकारी योजनाओं में उदाहरण को ही कोट कर लिया जावे तो पता लगेगा कि 17प्रतिशत लोग गरीबी में है परन्तु राशन की उपलब्धता करीब 80प्रतिशत को सुनिश्चित की जा रही है, जब इसका अध्ययन किया गया तो लगा कि शासन व्यवस्था, विकसित तंत्र एंव आमजीवन में यह पूरी तरह रचा बसा दिया गया है, इसके फायदे और कायदेनुसार सैंकड़ों गुणगान है 70 से अधिक योजनाओं में गरीब की भागीदारी । परन्तु वास्तविक अर्थ में क्या स्कूल में भोजन, सरकारी रसोई या हरघर राशन यही अब सपना होना ही चाहिए अथवा कार्य कुशलता, रोजगार की आवश्यकताओं के अध्ययन व भारी भरकम पूंजीगत-ढांचागत निवेश हेतु राष्ट्रीय धन को उचित निवेश । ’’निर्धन को धन राम’’ से उदृधित जुगल किशोर शर्मा