व्याकरण के आधार पर स्मृतियों, पुराणों आदि शास्त्रों के वचनों की शुद्धता अशुद्धता का निर्णय नहीं हो सकता। दोनों ही शास्त्र स्मृति कोटि के हैं। व्याकरण भी स्मृति है और पुराण आदि भी स्मृति ही हैं। स्मृति में जहाँ स्पष्ट द्वैध हो, वहाँ दोनों तुल्य होने से विकल्प होते हैं। अतः व्याकरण नामक स्मृति में कहे गए शब्दानुशासन के अनुसार प्राप्त साधु शब्द और अन्य स्मृति में प्रयुक्त शब्द दोनों ही साधु होकर विकल्प हो जाएँ, इसमें किस बुद्धिमान को आपत्ति हो सकती है?
जिस प्रकार यज्ञ में ब्रीहि और यव विकल्प से प्रयुक्त होकर अपूर्वजनक हो जाते हैं, तद्वत् शब्दों के अनुशासन में भी दोनों ही साधुता के मानक होकर अनादि सिद्ध शब्दार्थसम्बन्ध की व्यवस्था कर ही सकते हैं। विकल्प से दोनों का प्रयोग किया जा सकता है। कोई आपत्ति नहीं है। केवल कुतर्की मतिभ्रष्ट असाम्प्रदायिकों को ही इससे समस्या हो सकती है।
॥ जय श्री राम ॥