कुछ उलझनें ज़िंदगी में इस तरह की आ जाती हैं, पूरे वज़ूद को एक जाल की तरह जकड़ लेती हैं और उसे कमज़ोर बनाती जाती हैं.इनसे बच पाना,बाहर निकल पाना जैसे असंभव सा हो जाता है...मैं भी लगभग 2 साल से ऐसे ही जाल-जंजाल में कुछ तथाकथित अपने,बेगानों द्वारा फँसा दी गई हूँ... पता नहीं जीते जी इस जाल से बाहर निकल भी पाऊँगी या नहीं या अभिमन्यु की तरह उसी में अटककर रह जाऊँगी...... प्रांंजल,09/08/22,10.15P