नही जानती घड़े मे तुम हो ,
या घड़ा ही तुम हो !
भला जानूँगी भी कैसे ,
कोई जान पाया है क्या तुम्हे !
तुम्हारे सिवा | कहते रहे
अभिन्न हूँ तुमसे मै !
तुम्हे देख सकती हूँ मै केवल |
वो "मै" "तुम" कौन है |
यह प्रश्न मन की चार दीवारी से बाहर
निकल जिव्हा तक आ ही न पाये |
है अनेको छिद्र इस नाव मे मगर एक
अदृय हाथ भी जो नदि से नाव मे भर
रहे जल को उलच रहा है अन्दर से बाहर की
ओर , नाव चल रही है मंद गति से न जाने
कितनी दूर का सफर तय करना है इसे |
रोज अपना बोझ उतारती हूँ , विश्वार की
डोर तुम्हारे हाथो मे रखा है यह तुम्हे याद दिलाकर ,
हाँ ! मै जानती हूँ कि भूलते नही हो कुछ भी
तुम ! उह पंछी को भी जो रात्रि मे पेड़ों पर
बैठे - बैठे खुद को भूल जाता है तुम तब
भी उसे सम्भालते हो |
मुझे भी सम्भालना ऐसे ही
जब संसार की रात्रि मे मोह रूपी निद्रा ग्रसित करे |
यह पीड़ा जो हो रही है , मन ,हृदय मे प्रताड़ित करे ,
मेरा हाथ पकड़कर रखना |
तुमसे बँधी हूँ , बँधन भाया है ,
इसे छुड़ा मत लेना ,
तोड़ देना जगत के सारे बँधन
मुझे अपना लेना |
अर्पण करने जैसा कुछ बचा नही है,
तर्पण तुममे पहले ही हो चुकी |
शब्दो की बेला तो रंग बदलती है ,
चलती है जब मन के साथ भावना ,
कभी रोशनी कभी अंधेरा आँखों पर
मलती है |
नही बदला है तो तुमसे मेरा रिश्ता जो
तुम्हे खींच लाया है मुझ तक बस,
दिख रही है जो दूरी तुम्हारे ,मेरे दरमियान
उसे मेट देना , मिला लेना मुझे खुद मे ,
और बाकी मेट देना |
प्रेम