औरों को समझाया अक्सर
ख़ुद ही धोखा खाया अक्सर
रातें कितनी भी लंबी थीं
हमने सूरज पाया अक्सर
उतरा चाँद नदी में जब-जब
मछली ने नहलाया अक्सर
जिसकी बातों में जादू था
घर में तन्हा आया अक्सर
रिश्तों पर पत्थर रखकर ही
उसने नाम कमाया अक्सर
मौजें जब-जब रस्ता भूलीं
साहिल ने लौटाया अक्सर
उसकी ख़ातिर ग़ज़लें लिक्खीं,
जिसका नाम छुपाया अक्सर
...............सागर लुधियानवी