यही तो कहानी है हमारी
कुछ सिकुड़ी,कुछ बुदबुदाती,
धरती पर पड़ी, आकाश में तैरती
समुद्र के खारे पानी सी उछलती।
पृथ्वी सी घूमती
बसन्त और पतझड़ के क्रम में,
घर के अन्दर-बाहर
बनती-बिगड़ती।
यही कहानी है हमारी
घास की गठरी सी
हल पर जुती-फिरी,
पहाड़ पर उत्साह से चढ़ी,
तीर्थों पर आकर रूकी।
धूप सा आदर्श लिए
धुँये में हिली-मिली,
लड़ती-झगड़ती
प्यार के शब्दों में चली-मिली।
* महेश रौतेला