ग़जल
वो गुस्से में सब कुछ बोल दे तो जायज है
मै हसी मजाक भी कर लू तो ख़ता हो जाए
वो ख़ता करे तो भी ख़ता ख़ता मत समझो
मै अगर ख़ता सोचू भी तो ख़ता हो जाए
ये दिल उसे प्यार का मशीहा ही माना यारों
क्या पता यू ही जान रब से अता हो जाए
एक रिश्ता एक दिल दोनों काँच के जैसे हैं
इन्ही के दरमियाँ नीरस भी लता हो जाए
हा दोनों को सम्हालें और सब कुछ बचा लें
तो क्या हुआ गर उनको ही फ़ता हो जाए
ज्योति प्रकाश राय