मन का मूल अंश परमात्मा ही तो है | मन सहज है शुद्ध है निर्विकार है , जल से यदि उपमा दी जाये तो जैसा पात्र हो वह आकार ग्रहण कर लेता है असीमित शक्ति प्रधान है इसलिए विस्तृत है ठहराव नही | मन से सहज ,प्यारा ,कोमल इस संसार मे कुछ भी नही | समस्त संसार की पीड़ा सोखते हुए भी कलुषित नही होता | परमात्मा मे वरदान कल्याणरुप मे स्थित कल्याणकारक है , वही संहार रुप मे सृष्टि नियंत्रक , संरक्षक | मन स्वंय परमतत्व रुप है | मन मूल शाखा है परब्रम्हा की | मन से ही समस्त जगत का निर्माण हुआ है | मन सर्वेश्वर सर्वाकार है , निर्माण का आधार है | मन ही बोध है बोधत्व का परम मार्ग है शून्यता का |