लघुकथा
सब्र
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अभी अभी आए एक फोन ने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया।
दूसरी ओर से शील नाम की महिला बोल रही थी। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उन्होंने मुझे फोन क्यों किया।उन्हें मेरा नंबर किसने दिया।
खैर! वे बोल रही थीं।मैं चुपचाप सुन रहा था। उनका एक एक शब्द शीशे की तरह हृदय को चीरता जा रहा था।
और अंत में शील ने मुझसे सपाट स्वर में निवेदन किया कि मैं उनका मार्ग दर्शन करूँ ,वरना वे जहर खा लेंगी।
मैं असमंजस में था कि मैं क्या करुँ? एक तरफ कुंँआ तो दूसरी ओर खाई थी।
फिर भी मैंने उन्हें ढांँढस बँधाया और सिलसिलेवार ढंग से उन्हें समझाया।
फिर अंत में यही कहा कि सब्र कीजिए और खुद पर विश्वास कीजिए। हर समस्या का हल मिल जाएगा। जब तक सब्र नहीं होगा, हल उतना ही दूर रहेगा।
सब्र कीजिए और खुश रहकर समस्याओं का सामना कीजिए।जहर खाने की बात भी दिमाग में नहीं आएगा उसके बाद भी मरने का शौक है तो जरूर मरिए, मगर ये भी सोच लीजिए कि आपके मरने से भी समस्याएं हल नहीं होंगी और न ही किसी को फर्क पड़ने वाला है।
शील का जवाब सुनकर मुझे संतोष हुआ कि सब्र के फार्मूले के साथ मैं किसी के काम तो आया।
शील ने कहा कि विश्वास नहीं होता भाई साहब। मुझे न जानते हुए भी आपने मुझे इतना अच्छे से मार्ग दिखाया। मैं उस सहेली का धन्यवाद करती हूँ, जिसनें बड़े विश्वास से आपका नंबर देकर मुझे बात करने को विवश किया।
उसने चरण स्पर्श कह कर फोन काट दिया।
सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा, उ.प्र.
8115285921
©मौलिक, स्वरचित