नीति गीत कहाँ गया है बन्धु
लुटा पड़ा है सब आकाश,
धरा निर्वस्त्र होने को है
वृक्षों की हो गयी है शाम।
जन- जन में बढ़ा आक्रोश
नीति गीत कहाँ गया है बन्धु,
सत्य-शुद्धता हुये हैं पंगु
कलयुग में बड़ा है आतंक।
पूजा किसकी करूँ मैं बन्धु
सब देव हुये हैं अस्त,
प्यार पिपासा बढ़ी है बन्धु
सब लोग कहाँ हैं व्यस्त!
* महेश रौतेला