मुकम्मल हो जाएं ख्वाब जो दिदार-ए-हुस्न हो जाएं ,
आप आए तो खिजां मैं फिर से बहार आ जाएं ।
रुक जाओ पल दो पल हमारे इस आसियाने में ,
हो सके कि सोई हुई कलीयो में खुमार आ जाएं ।
रुतबा है खुदा का हर ज़र्रे में हमने जाना , मगर
आप हो तो फरेब कि दुनिया से आजाद हो जाएं ।
सहेलाना मत अपनी लटो को नाजुक ऊंगलीओ से ,
कहीं हमारे अनकही ख्वाहिशें ना बिखर जाएं ।
साथ जरुर देना हमारा इस मुहब्बत के रास्तों पर ,
कहीं हम जरुरतों के गलियारों में ना खो जाएं ।