हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है. बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा"
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अल्लामा इक़बाल के इस बहु उद्धरत शेर का भावार्थ कुछ ऐसा है -
किसी मूल्यवान/गुणवत्तापूर्ण/आकर्षक या प्रभावशाली वस्तु/व्यक्ति इत्यादि के गुणग्राहक,प्रशंसक, फैन,या शैदाई का न होना जो उसके मूल्य और महत्व को समझें।
सरल शब्दों में कहें तो वो जो सराहे जाने लायक है उसकी एक बड़े जन समुदाय द्वारा अन्जाने में निरन्तर उपेक्षा किया जाना।