मुझे उठने दो
श्रीकृष्ण के संवादों तक,
मीरा की भक्ति तक
गंगा के निर्मल जल तक।
मुझे उठने दो
प्यार की उज्जवलता तक,
फूलों के विकास तक
आँखों के आँसुओं तक।
मुझे उठने दो
खिलखिलाती मुस्कान तक,
गीत के भाव तक
मनुष्य की संवेदना तक।
मुझे उठने दो
इस पार से उस पार तक,
इस वेदना से उस वेदना तक
इस प्रकाश से उस प्रकाश तक।
** महेश रौतेला