सोने की चिडिया
पक्षी सूर्योदय के साथ
अपने दलों में निकलते है
सूर्यास्त पर वापिस लौटते है
एक साथ रहकर जीते है
सुखी और प्रेमपूर्ण जीवन
लेकिन हम
अहं में ही जीते है
और अहं में ही मरते है
यदि हमारे मैं की जगह
हम का भाव आ जाए
समाज में क्रांति हो जाए
इस क्रांति से धन, संपदा,
वैभव व प्रगति पाकर
व्यक्ति ही नही पूरा समाज
लाभान्वित हो जाए
सुख व प्रेम से आप्लावित होकर
सुदृढ राष्ट्र का निर्माण हो जाए
देश पुनः सोने की चिडिया
बनकर महान कहलाये l