भागते-दौड़ते अब थकने लगे कदम,
कर लेते हैं अपनी गति जरा मद्धम,
जिंदगी के दिन बचे हैं यारों बड़े कम,
सोच लेते हैं अब अपने बारे में हम।
अब चलने में सांसे उखड़ने लगी हैं,
अक्सर धड़कने भी तो बढ़ने लगी हैं,
रौशनी आंखों की धुँधली पड़ने लगी है,
बेवफा नींद भी हमसे बिछड़ने लगी है।
परिंदे उड़ चले हैं अपने आसमान में,
बना लिए हैं आशियाने नए ज़हान में,
हम तलाशते हैं यादें पुराने समान में,
किस इंतजार में हैं खाली मकान में।
क्यों अकेलेपन का करें हम मातम,
उससे पहले की हो जाए तन बेदम,
भर दें हंसी-खुशी से सारा आलम,
सोच लेते हैं अब अपने बारे में हम।
रमा शर्मा 'मानवी'
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