मेरे अंतर में कब झाँक कर देखोगे ।
कब व्यथाएँ हमारी तुम सुन पाओगे ।।
अपने पहरे हटाओगे कब आप सब ।
साँसो में ताजगी मेरे भर पाओगे ।।
मुझको ज्ञानी बनाने की इस दोड़ में ।
मेरा बचपन कुचलकर कहाँ जाओगे ।।
मुझसे बातें करो कुछ मेरी भी सुनों ।
मेरे अस्तित्व को कब तक झुठलाओगे ।।
अपनी मुट्ठी में मैं कुछ लिए आ गया ।
इसको इनकार कर तुम कहाँ जाओगे ।।