प्रकृति का नर्तन.........
**************
चराचर जगत में जीव
प्रकृति से श्रंगार पाता है
सुर-ताल से नर्तन करते
जीने का आधार पाता है
प्रकृति के नर्तन से झूमे
हर्षित सृष्टि चंहुओर है
संगीतमय धरा पर बाजे
कलरव का कैसा शोर है
आत्ममुग्ध लय-ताल से
हरित प्रकृति लुभाती है
लावण्य से श्रंगारित हो
नाद स्वर भी सजाती है
एम.एल. नत्थानी