जब मोह बीच मेंं बैठा था
तो घोर अन्याय होना तय था,
शक्ति इधर भी,शक्ति उधर भी
धरती में रण का डेरा था।
यह भूख सत्ता की अद्भुत थी
जो जीवन को जीवन से विलग किये थी,
हर व्यक्ति रण को तत्पर था
हर युद्ध यहाँ पर छोटा था।
जब तक पंख कटे नहीं
तब तक उड़ान जगमग थी,
यह भूमि सशक्त, पर रक्तरंजित है
जहाँ जय-पराजय,अतिरंजित हैं।
नदियों का जल मीठा है
समुद्र सारा खारा है,
मानव मन की महत्वकांक्षा में
मीठा-खारा सब पड़ता है।
जब स्वार्थ मनुष्य पर हावी हो
उचित-अनुचित में भेद कठिन है,
ज्ञान कितना ही सशक्त हो
सद्बुद्धि का मिलना दुर्लभ है।
* महेश रौतेला